Desire Quotes in Hindi | इच्छा पर अनमोल वचन |निश्चित रूप से खुद को प्रेरित महसूस करेंगे

जीने की इच्छा…………..

कोई भी मनुष्य बूढा हो, जवान हो, गरीब हो, अमीर हो, भोगी हो या त्यागी हो, लेकिन हर मनुष्य में जीने की इच्छा सबसे पहली और आखिरी होती है। कोर्इ भी मरना नहीं चाहता। बड़े से बड़ा त्यागी, तपस्वी भी जीना चाहता है। आखिर क्यों जीना चाहता है? विचार में तो सबसे प्रमुख कारण सुख ही है, यह बात अलग है कि हर मनुष्य अलग अलग बातों में सुख महसूस करता है। जिसे खाने का शौक होता है उसको बढिया खाने में सुख मिलता है। और गाने वाले में गाने में सुख महसूस करते हैं। संगीत प्रेमी संगीत में सुख अनुभव करते हैं। संक्षिप्त में सामान्य मनुष्य इंद्रियों के विषय में सुख महसूस करता है, और सारा जीवन उन सुखों को प्राप्त करने में ही लगाता है। उसके ऊपर उठकर वे लोग होते हैं जिन्हें विषय विशेष पसंद नहीं आते, लेकिन वे कुछ अन्य बातों में सुख अनुभव करते हैं। माता पिता अपनी संतान को सुख पाते देख कर सुखी होते हैं। विव्दान उनके अनुरुप ज्ञान में सुख महसूस करते हैं। परोपकारी दूसरों का कल्याण कर सुख पाते हैं और दुष्ट दूसरों का दु:ख देखकर सुख अनुभव करते हैं। क्या यही हमारे जीवन का अर्थ है? हमें जीने की इच्छा क्या इन सभी बातों की वजह से होती है। यदि हम किसी विषय में सुख महसूस नहीं करते तो क्या हमें जीने का कोर्इ अधिकार नहीं है? कबीर साहब तो कहते हैं – तन धारण करने के बाद सुख तो किसी को भी नहीं मिला है, क्योंकि हम हमारे कर्मबंधन के कारण यहाँ पर आये हैं, उसे हमें भुगतना ही पडेगा।

सारे जीव-जंतु र्इश्वर की संतान हैं – र्इश्वर की उपासना करने के लिए जप-तप करने की बात आती है तो फिर लोग र्इश्वर को अज्ञानी, अल्पशक्ती, सीमित सामर्थ्य वाले मनुष्य की तरह अपने से अलग कोर्इ व्यक्ति मान लेते हैं जिसे कोर्इ बात बताने पर ही मालूम पडेगी। मानसिक प्रेम को शारीरिक श्रम करने, तीव्र यातनामयी पीड़ा को सहन करने और भौतिक वस्तुओं का त्याग करने और अच्छे पदार्थो को लाकर देने से र्इश्वर प्रसन्न होता है, उसे प्रेम की गहरार्इ पता चलती है, एैसा मानना प्राय: सभी संप्रदायों में देखा जाता है. परंतु इससे ईश्वर में उस वस्तु की कमी सिद्ध होती है, और र्इश्वर में तो कोर्इ कमी या न्युनता नहीं है, इस कारण जो लोग र्इश्वर की प्रसन्नता के लिये वस्तुओं की, अन्य प्राणियोंकी, मनुष्य और बच्चों की बली चढाते हैं, वे भूल जाते हैं कि परमात्मा सारे संसार का निर्माता है। उसकी ही वस्तु का नाश करके उसे देने पर वो कैसे प्रसन्न होगा। सारे जीव-जंतु उसीकी तो संताने हैं, उन्हें परमात्माने ही निर्माण किया है। उन जीवों का परमात्मा की सृष्टी में निश्चित स्थान है। और वे उसका बताया हुआ काम करते हैं। हर वस्तु एवं जीवों का अपना एक महत्व है। उनका निर्माण परमात्मा ने विशिष्ट उद्देश से किया है। उनको नष्ट करना मतलब परमात्मा की सृष्टी में हस्तक्षेप करना होता है। इसलिये एैसी विचारधारा को त्यागना होगा।

र्इश्वर हृदय के अंदर है – परमात्मा को मिलने के लिये हम कहाँ-कहाँ नहीं जाते और कितनी सारी पुस्तकों का अध्ययन करते हैं, जिससे परमात्मा की स्तुति करके आनंद प्राप्त कर सकें। एैसा करने में पूरी की पूरी जिंदगी बीत जाती है लेकिन फिर भी अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते हैं। कबीर जी कहते हैं – जिसको ढ़ूढने में लोगों ने अपनी सारी जिंदगी लगा दी, जिसकी चर्चा के लिये हजारों किताबें लिखी गयी, लेकिन उसका गुणगान गाया नहीं जा सकता, वह सबके अंदर पहले से ही विराजमान है और वह इंतजार कर रही है कि हम उसे देखें और अपने ह्रदय के अंदर संतुष्टी प्राप्त करें।

जीवन का आनंद – जब हम अपने अंदर देखने की कला को जान जाते हैं, तभी उसको स्वयं के अंदर का नजारा दिखार्इ देने लगता है. जिसने उस नजारे को देखा वह उसे देखते ही रह जाता है। उस नजारे का वर्णन करना कठिन है, अचरज का वर्णन नहीं किया जा सकता। जीवन के सभी रंग अपने अंदर मौजूद हैं, काला भी है, पीला, सफेद, नीला और लाल भी है। यह सब हमारे भौतिक जीवन के अनुभव से परे है। सब कुछ प्रखर होते हुए भी शांतिदायक है। हर स्वांस के अंदर प्रत्येक मनुष्य की खुशी का खजाना भरा हुआ है। हर स्वांस के आने-जाने में आनंद छिपा हुआ है। स्वांस अपने आप आयेगा, अपने आप जायेगा, हृदय कि शांति, हृदय का आनंद, जीवन का आनंद तब प्राप्त होगा जब अंतरमुखी हो जाओगे।

अपने आप को सर्व श्रेष्ठ मानना – मनुष्य बिना किसी प्रमाण के अपने आप को सर्व श्रेष्ठ मानता है। मनुष्य कोर्इ एक विषय में पारंगत हो सकता है लेकिन सभी विषयों का सर्व श्रेष्ठ ज्ञान मनुष्य के पास हो यह संभव नहीं है। और जो लोग एकही विषय में पारंगत हैं, वे भी उस विषय पर अपना अलग-अलग मत रखते हैं क्योंकि कुछ अज्ञान अभी बाकी रहता है। जैसे-जैसे विषय गंभीर और कठिन होता जाता है, हमारा मतभेद भी बढ़ता जाता है। जिन विषयों को हम अपनी इंद्रियों से बुद्धि दुआरा जान सकते हैं उदा. आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा आदि. उसका विवाद परिक्षण करके समझाया जा सकता है। पर आत्मा है या नहीं, परमात्मा है या नहीं, पुनर्जन्म होता है या नहीं, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण किसी के पास नहीं, एैसे विषयों पर हर व्यक्ति दूसरे से अलग मत रखता है। किसने किसके घर जन्म लेना यह हमारी मर्जी पर निर्भर नहीं है. परमात्मा ने कोर्इ जाति, धर्म नहीं बनाये हैं, यह सब हमारे बनाये हुए हैं। कौन कहाँ जन्म लेगा इसका निर्णय परमात्मा ही करता है। किसी विषय पर अपना स्वतंत्र मत रखने का अधिकार परमात्मा ने हमें दे रखा है। चाहे आप उसको मानो या न मानो क्योंकि उसका न्याय सभी के लिये एक जैसा है। परमात्मा भेदभाव नहीं करता, वह नास्तिक व्यक्ति को भी जन्म देता है और आवश्यक सभी सुविधायें भी उपल्बध कराता है, फरक तो हमारे अंदर है। जो हम फालतु की बातों पर ध्यान देकर अपना समय नस्ट करते हैं

Best Hindi Quotes – जो आपके सोचने का नजरिया बदल देंगे। निश्चित रूप से खुद को प्रेरित महसूस करेंगे

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